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झील में टिमटिमाता सूरज


        
वो साथ ही तो थे, 
फिर भी उदास क्यों थे.. 
दिल की गहराइयों में, 
बेइंतहाँ मोहब्बत थी.. 
फिर भी नज़रों में प्रेम नहीं ,
धुंध क्यों थी...! 
कोई खामोश लम्हा, 
बीत जाने को बेकरार था.. 
अगला पल दस्तक.. 
देने को आमादा था...! 
न रोशनी थी, न अंधेरा था
कहीं गहरे में डूबती सांसों
की मद्धिम सी धुन थी....
ज़िंदगी का वो पहर भी, 
गुजरे कल में शुमार हो गया! 
अभी तो आस पास था,  
अचानक ही
 दर किनार हो गया! 
झील में सूरज  
टिमटिमाता रहा...
आँखों का धुआँ 
डूबते सूरज के साथ 
झील के अंधेरे ठंडे.. 
पानी में सो गया! 
                     --डॉ सीमा सिंह 

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