आंधियों के थपेड़ों से,
पैर बोझिल हो गए
बदन जर्जर हो गया !
चक्रवाती बवंडर में,
तन से मन ही बिछड़ गया!
पथरीली पगडंडी पर,
झरना खोज रहे थे
तभी एक चीत्कार उठी,
और अचानक इन आँखों के
कोने से बहता दरिया देखा !
अश्कों में डूबी नाव,
कहाँ तैर पाती है
गीली-गीली यादों में,
सिमटा कल
भारी-भारी लगता है!
थक गया बदन,
रूह भी थक गई
ये तन ज़िंदगी भर,
स्वयं से सच छिपाता है
सच तो ये है कि ..
ये उम्र भर
बस थकान ही
ओढ़ता बिछाता है!
--डॉ सीमा सिंह
Very nice
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