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कविता- कोरोना से डरो ना : By - Dr Seema Singh

    कोरोना वायरस कोरोना से डरो ना , बार-बार कहती हूँँ कि कोरोना से डरो ना !  ये एक वायरस है, जो चीन से है फैला डराता है उन सभी को, जो हाथ रखें मैला ! बार-बार हाथ धो लो साबुन, हैंडवॉश ले लो गंदे हों तब भी धो लो ना हों गंदे तब भी धो लो हाथ गंदेे रखो ना कोरोना से डरो ना ! बिना हाथ, रुूमाल ,टिशू के खुले में छींको, खाँसो ना नमस्ते दूर से कर लो किसी से हाथ मिलाओ नाा बिना बात के ऐसे ही मुँँह,नाक और आँख बार-बार तुम छुओ ना कोरोना से डरो ना ! जिसको भी हो जुकाम जरा सा उसके पास बैठो ना उससे बोलो मास्क लगाए, कहने में शरमाओ ना खाँँसी हो, बुखार हो सिर दर्द हो या बदन दर्द अगर दिखा है  कोई लक्षण फौरन तुम हॉस्पिटल जाओ ये है बहुत जरूरी बात लापरवाही बरतो ना कोरोना से डरो ना! जहाँ भीड़ हो, मास्क लगाओ लोगों सेे तुम दूूूरी बनाओ काम जरूरी यदि हो ना भीड़ में तुम जाओ ना कोरोना से डरो ना ! सब्जी,फल सब ठीक सेे धो लो अधपका कुुुछ खाओ ना कुछ दिन घर में ही रह लो कहीं घूमने जाओ ना तापमान जब बढ़ता है कोरोना भी डरता है हो सके गर मुमकिन तो ठंडा खाओ पियो ना कोरोना से डरो ना ! बार-बार कहती हूँँ कि को...
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कविता - ' दंगा दिल्ली का ' :By -Dr. Seema Singh

                                दिल्ली हिंसा 2020                                                 चलो करते हैं बात मोहब्बत की,                  बेवजह बैर क्यों बढ़ाया जाए !                  फ़र्क क्या है ख़ून में दोनों के,                  चलो ब्लड टेस्ट ही कराया जाए!                  पत्थर हों या हों पेट्रोल बम, या                  फेंकी तुमने तेज़ाब की थैली,                   जो जले वो कौन थे...                   हिन्दू भी थे, मुस्लिम भी थे       ...

कविता - ' यादें अब भी आबाद हैं ' : By --Dr. Seema Singh

              यादें अब भी आबाद हैं                      वीरान है ये गाँव ,                       तो क्या हुआ...                      पेड़ों की शाखाएँ,                     प्यार से हाथ पकड़ती हैं !                     वो जो अपने अब नहीं हैं,                     उनकी कहानी ये कहती हैं                      माटी पाँवों से लिपटकर,                      बार-बार दुलराती है..                      वो कोयल अब भी,                   ...

कविता- ' कुछ तो मिटे थकान ' :By -Dr. Seema Singh

                                     आंधियों के थपेड़ों से,                               पैर बोझिल हो गए                               बदन जर्जर हो गया !                               चक्रवाती बवंडर में,                               तन से मन ही बिछड़ गया!                               पथरीली पगडंडी पर,                               झरना खोज रहे थे                           ...

झील में टिमटिमाता सूरज

         वो साथ ही तो थे,  फिर भी उदास क्यों थे..  दिल की गहराइयों में,  बेइंतहाँ मोहब्बत थी..  फिर भी नज़रों में प्रेम नहीं , धुंध क्यों थी...!  कोई खामोश लम्हा,  बीत जाने को बेकरार था..  अगला पल दस्तक..  देने को आमादा था...!  न रोशनी थी, न अंधेरा था कहीं गहरे में डूबती सांसों की मद्धिम सी धुन थी.... ज़िंदगी का वो पहर भी,  गुजरे कल में शुमार हो गया!  अभी तो आस पास था,   अचानक ही  दर किनार हो गया!  झील में सूरज   टिमटिमाता रहा... आँखों का धुआँ  डूबते सूरज के साथ  झील के अंधेरे ठंडे..  पानी में सो गया!                       --डॉ सीमा सिंह